kavita by BRAHMA DEV SHARMA

आना तुम्हारा जिंदगी में इस तरह का हो गया।
जैसे कि कोई गुल खिला औ’ मुस्कुराना हो गया।।

हमने कभी कोई कहानी प्रेम की बाँची नहीं।
बन हीर जब मन से मिलीं , राँझा सरीखा हो गया।।

काँटे सदा चुभते रहे हमको यहाँ हर मोड़ पर।
खाकर बहुत से जख्म तन फौलाद जैसा हो गया।।

कहता रहा इक दर्द भी अपनी कहानी रात-दिन।
सुनता रहा ,रोता रहा वह भी हमारा हो गया।।

बालक बने जब खेलते मुझसे रहे दिन-रात वो।
चटका कहीं,बिखरा कहीं,टूटा खिलौना हो गया।।

सबको लगाता हूँ गले, सबकी भलाई सोचकर।
मैं बाँटता हूँ खुशबुएँ कातिल जमाना हो गया।।

कैसे दिखाऊँ आपको मन में दबी हर पीर को।
सीने दबा था जो में’रे वो दिल पराया हो गया।।

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