#Kavita by Brij vyas

” है विकास में देर अभी ” !!

हरियाली सब और नहीं है ,
हरा भरा सब छोर नहीं है !
यहाँ प्रकृति जी भर देती ,
रूठा मौसम ठौर नहीं है !
बैलगाड़ी है ,बैलजोड़ी है –
खाते रूखा कोर अभी !!

जल संसाधन थोड़े थोड़े ,
हम तो सदा रहे निगोड़े !
भूमि उर्वर रही नहीं है ,
खर्च न्यून पाई पाई जोड़े !
अच्छी फसल दाम कम मिलते –
बिगड़ी फसल नुकसान तभी !!

पशुधन भी अब हाथ कहाँ ,
चारागाह ना बचे यहाँ !
राजनीति ने कुछ ना छोड़ा ,
नेताओं से सभी तवाँ !
भाग दौड़ है और परिश्रम –
किस्मत देती साथ कभी !!

बृज व्यास

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