kavita by chandan mukherjee

अजनबी

अजनबी वो थे
अजनबी हम थे
वो आँखें फिर भी
दोस्ती कर रही थी
लब किसी के
अभी खुले न थे
धड़कन दिल की
बढ़ चली थी
पैरों से ज़मी को
वो कुरेद रही थी
मैं उलझन में था
पर दोस्ती आँखों
से बढ़ रही थी
दोनों थे बस
आमने-सामने
लगे थे दोनों ही
दिल को थामने
कुछ अनोखा सा
ये किस्सा था
पहले प्यार का
यही किस्सा था
शायद प्यार
इसी को कहते है
मैं सोच रहा था
वो भी सोच रही थी
पर वो आगे बढ़कर
कुछ न बोली
मैं खड़ा था चुप सा
उसे क्या बोलूँ
क्या वो बोलेगी
या मैं बोलूँ

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