#Kavita by Chetan Krishan Shastri

राष्ट्रीय हित का गाला घोंठ कर छेद न करना थाली में

मिटटी वाले दिए जलाना अबकी बार दिवाली में।

 

देश के धन को देश में रखना नहीं बहाना नाली में 

मिटटी वाले दिए जलना अबकी बार दिवाली में।

 

बने जो अपनी मिटटी से वो दिए बीके बाज़ारो में

छुपी है वैज्ञानिकता अपने सभी तीज-त्योहारो में ।

 

चाइनीज़ झालर से आकर्षित कीट पतंगे आते है 

जबकि दिए में जलकर बरसाती कीड़े मर जाते है।

 

कार्तिक दीपदान से बदले पितृदोष खुशहाली  में

मिटटी वाले दिए जलाना अबकी बार दिवाली में।

 

कार्तिक की अमावस वाली रात न अबकी काली हो

दिए बनाने वालो के भी खुशियो भरी दिवाली हो

 

अपने देश का पैसा जाए अपने भाई की झोली में

गया जो दुश्मन देश में पैसा लगेगा राइफल गोली में ।

 

देश की सिमा रहे सुरक्षित चूक न हो रखवाली में

मिटटी वाले दिए जलाना अबकी बार दिवाली में।⁠⁠⁠⁠

 

 

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