#Kavita by Dharambir dhull

ईश्वरीय परछाईं

हे ईश्वर !
दर्शनों की अभिलाषा है
तनिक दर्द छट जाए
बस, एक यही आशा है
सहसा ,एक आवाज आई
अंतर्मन से, गौर से देखो
वो हरा तना, हरियाली
सूखा लकड़ी का गठ्ठा
वो तन्हाई में डूबा पहाड़
कलकल करती सरिता
सूखी नदी के पत्थर
अवरुद्ध सा झरना
उथला शांत ,अशांत सागर
चाँद का दाग,परछाई
सूरज की तपस
धरा का रूप
कठोर और विनम्र स्वरूप
जीव का पोष
जीवन का उद्घोष
सभी नियमो मेँ बंधे है
और तुम बाहर क्यों जाना चाहतो हो?
उत्कृष्ट बन
मै तुम्हारे साथ हूँ
निकृष्ट बन
तदापि साथ ही हूं
कड़ियाँ जोड़ या तोड़
स्नेह करुणा भर
श्रम का साझी बन
साथ दूंगा
क्रोध की ज्वाला बन
छीन कर खा
तदापि साथ दूंगा
लेकिन जान लो
कर्म तुम्हारा है
परिणाम भी तुम्हारा है
हार जीत
सब तुम्हारी है
परिणाम की अनुभूति कर
जिओ ,जिओ जी भरके
मै तम्हारे साथ हूँ
बस,परिणाम लेते जाओ!”

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