#Kavita by Dr. Sarla Singh

आखिर क्यों?

क्यों आखिर हार जाती हूँ मैं ,

चलने से पहले ही सखी।

रुकने लगते है मेरे कदम,

मंजिल आने से पहले ही ।

स्वयं में खो जाती हूँ मैं,

कुछ कहने के पहले ही।

क्यों साहस नहीं मुझमें है,

औरों की तुलना में सखी।

क्यों खो देती हूँ विश्वास ,

खुद अपने पर ही सखी ।

कोई तो बता दे जरा मुझे ,

मेरी उलझन का कोई हल।

लोग कहते है तब ही क्यों,

करती नहीं खुद खुद पे यकीं ।

जिंदगी का सफर कर इतना,

आज भी लगता पहली सीढ़ी।

अपने से छोटे भी लगते बड़े,

खुद ही खुद को भूल जाती हूँ।

रोशनी में ही चल पाती हूँ,

क्यों अंधेरों से डर जाती हूँ ।

हर एक काम में साथ ढूंढ़ती हूँ,

क्यों अकेले नही चल पाती हूँ।

सारे साजोसमान संग मेरे ,

मेरे स्वर क्यों नहीं सजते ?

क्यों आखिर हार जाती हूँ,

चलने से पहले ही सखी ।

डॉ.सरला सिंह।

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