# Kavita by Dr. Yasmeen Khan

हाइकु

रब ही ठौर

असीम असंतोष

त्रासदी घोर।

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मातृ भूमि है

स्वर्ग इस सृष्टि का

गर्व करो जी।

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शिष्ट ही झुका

अंधड़ ने पटका

जो न लचका।

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उड़ाये रंग

गरजें विपदाएँ

किसी

छीन लें ढंग।

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बहते धारे

सुख दुःख किनारे

नियति तारे।

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आशा की छाँव

कल्पना के पड़ाव

स्वप्न बसते।

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लगाके घात

पाक साख तो ख़ाक़

खायेगा मात।

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झगड़े छोड़ो

एकता गीत गाओ

बन्धुत्व ओढो।

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दीवारें खड़ी

आँगनों में स्वार्थ की

बस ज़िद्द अड़ी।

डॉ.यासमीन ख़ान

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