kavita by Er.Waseem Khan

“ ऐ बापू वापस आ जा , फिर से तेरी ज़रूरत है “

मेरे शहर के चोराहे पर , बापू की जो मूरत है |

आँखें इसकी नम हैं आज , रोई रोई सूरत है ||

देख रही हैं सबकुछ लेकिन , कहने से मजबूर हैं |

दिल है इसका घायल,और आत्मा गम से चूर है ||

ज़ात धर्म के   झगड़े में , फंसा  हुआ इंसान है |

रोती है ये त्याग की मूरत,मानवता का अपमान है||

था तूने जो आज़ाद कराया , क्या ये वो देश नहीं है|

यहाँ याद किसी को तेरा अब , कोई संदेश नहीं है ||

तेरा जतन बेकार गया , मानवता अब  भी  बंदी है |

सच की पूजा कौन करे , यहाँ नियत सबकी गंदी है ||

युग  बदला, शब्द  बदले , बदल  गया  परिवेश  है |

बापू   तेरे  बंदरों  का भी ,  बदल  गया  संदेश  है||

सच  देखना  यहाँ पाप है , सच  बोलना अपराध है |

बंद कान से सुनता कौन , मानवता की फरियाद है ||

बापू  तेरी  मूरत के आगे , यहाँ  होता  अत्याचार है|

तू  देख  रहा सब हेरा फेरी ,  बैठा  बीच  बाज़ार है||

नहीं सच्चाई के वास्ते , निकलता कोई महूरत  है|

ऐ बापू  वापस आ जा ,  फिर से  तेरी ज़रूरत है||

Leave a Reply

Your email address will not be published.