kavita by gourav shukl manyora

“तुम्हारे साथ चलने की तमन्ना तो बहुत थी पर ,
हमारे प्यार का मौसम तुम्हें कुछ रास ना आया ।

बड़े वादे किये तुमने, बहुत कसमें उठा   डालीं,
गले लगकर हमारे सैकड़ों रसमें  निभा   डालीं।
सजाया माँग को अपनी, कभी सिंदूर भरवाकर ,
कभी छू पैर मेरे, जोड़ सब बंधन लिये  आकर।

जनम-जन्मांतरों तक साथ रहने की दुआएँ कीं,
हमारे साथ जीने और      मरने  की दुआएँ कीं।
कभी जा मंदिरों में, हाथ माँगा एक दूजे     का,
मजारों पर पहुँचकर साथ माँगा एक दूजे   का।

हमारे हेतु  करवाचौथ तक का व्रत रखा  तुमने ,
कभी बरसाइतें पूजीं,नहीं क्या क्या सहा तुमने।
तुम्हीं ने तो कहा था एक मंगलसूत्र ले   आओ,
उसे मेरे गले में पत्नियों की भाँति     पहनाओ।

तुम्हारे ही कहे ये शब्द क्या अब याद हैं तुमको?
न भूले क्या हमारे बीच के      संवाद हैं तुमको?
हमारी चाहतों ने कौन सा प्रतिबंध  माना    था?
नहीं हद पार की थी कौन क्या वो भी जमाना था?

कहाँ से हम चले थे और फिर पहुँचे कहाँ पर थे?
वहाँ पर क्या बकाया रह गया था हम जहाँ पर थे?
हमारी पीठ पीछे हलचलें कुछ कम मची थीं क्या?
जमाने ने कहीं पर साजिशें कुछ कम रची थीं क्या?

मगर जब इम्तिहानों को सभी हम पास कर आये,
हजारों मील चलकर मंजिलों पर जब पहुँच पाये-
अचानक पैंतरा तुमने बदलकर क्या न कर डाला,
हमारा कत्ल कर डाला, हमें बरबाद   कर डाला।

कमी थी कौन मुझमें, जो न तुम मुझसे निभा पाईं?
गया मिल कौन, पाकर के किसे इस भाँति इतराईं?

नतीजा प्यार का ये है समझ लो ऐ जमीं वालों,
मुझे लो देख मैंने क्या लुटाया और क्या पाया?

तुम्हारे साथ चलने की तमन्ना तो बहुत थी पर ,
हमारे प्यार का मौसम तुम्हें कुछ रास ना आया॥”
-गौरव शुक्ल
मन्योरा
लखीमपुर खीरी

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