kavita by Jayanti Prasad Sharma

पापी पेट का सवाल है

पापी पेट का सवाल है पापी पेट का सवाल है।
न होता अगर पेट पापी,
न मांगती भीख सोना,
न काटता जेब पप्पू ,
न नाचती महफिल में मोना।
पेट की खातिर बन गया भीखू,
कोठे का दलाल……………………... पापी पेट का……….. ।
पापी पेट की आग से,
पशु पक्षी भी जल रहे।
तोता, मैना, बन्दर, भालू
सर्कस में खेल कर रहे हैं।
भूखे पेट शेर और हाथी,
दिखा रहे रिंग में कमाल……………. पापी पेट का……….. ।

भूखे आकर राजनीति में,
खूब खाते हैं ।
फिर भी नहीं अफरते,
पेट इनके बढ़ते जाते हैं।
कोई उठा देता है ऊँगली,
करवा देते हैं बवाल…………………. पापी पेट का……….. ।
कुछ खा गये भैंसों का चारा,
कुछ ने डकारे तेल में।
कुछ ने दिखाई कला बाजियां,
खा गये अरबों खेल में ।
नहीं शरमाते भ्रष्टाचारी,
उनको नहीं होता मलाल……………. पापी पेट का……….. ।
जयन्ती प्रसाद शर्मा

पथिक
पथिक तुम कौन देश से आये।
रहे घूमते यों  ही निष्फल–
या कोई मंजिल पाये……………………..…………….पथिक ….. ।
ठहरो पलभर लो विश्राम ,
थकित पगों को दो विराम ।
कहो हमें मन्तव्य तुम्हारा ,
बतलाओ गन्तव्य तुम्हारा।
भूल गये तुम अपनी मंजिल या पथ विसराये……..पथिक ….. ।
हो अवधूत या तुम
अथवा किसी देश के गुप्तचर।
बने हुये हो तुम घुमन्तु,
किसी धर्म प्रचार में हो कर तत्पर।
शान्ति दूत हो किसी देश के सद्दभावना मिशन पर आये……..पथिक ….. ।
दूत नहीं अवधूत नहीं,
नहीं यायावर नहीं गुप्तचर।
मै वासी हूँ इसी देश का,
निःसंदेह है बंधु प्रवर।
देख दुर्दशा प्यारे भारत की घूम रहा अकुलाये……..पथिक ….. ।
राजनीति में हो गई अनीति,
घुस बैठा परिवार वाद ।
बढ़ गया भ्रष्टाचार देश में,
फल फूल रहा आतंकवाद ।
कोई आये इन भूले भटकों को कर्तव्य का बोध कराये……..पथिक ….. ।

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