#Kavita by Jyoti Mishra

लड़की या लाचारी

खुली ऑखे जब से,

अंधेरा मिला है . . .

हूं जब  एक लड़की तो,

कैसा गिला है. . !

रस्मो – रिवाजों के घनेरे है पहरे,

गंदी नजर, ताने

जख्म देते हैं गहरे

यहां हर मोड़ पर

रोक -टोक का सिलसिला है. . . !

यहां तुम न जाओ,

वहां तुम न जाओ. .

अकेली न जाओ

न रातो को आओ. .

ये न  तुम आजमाओ

बस  इज्ज़त बचाओ

मसल ख्वाईश कली की

फूल सुंदर कब खिला है … !

गगनचुंबी हसरत

हर पल दम है तोड़े,

घुटन है  , कुढन है

चूर चाहतो की चुभन है. .

बन के सूरज सा चमकू

दूर नीला गगन है . . .!

रोशनी कैसे आए ,

बंदिशो का किला है  ।

ज्योति मिश्रा

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