#Kavita by Jyoti MIshra

चांद सलोना

मुझे सुलाने आज उतर कर

चांद सलोना आया है . . . .

दबे पांव खिड़की से आकर अपनी

चांदनी से मुझे नहलाया है. . . !

मुझे सुलाने …..

बादल की झिलमिल, झुरमुट से

ऑख मिचौली हमने खेली

रात -रात भर, जाग -जाग कर

की थीं, बातें सुन्दर ,  भोली

निंदिया से मेरा ये अद्भुत

बैर, न वो सह पाया है. . . .

मुझे सुलाने. . . . . .

घोर  अंधेरी रात में काली

जुगनू सी जलती -बुझती थी

उम्मीदों की बाती खाली

टांक के टिमटिम तारों की चमचम

चादर मुझे ओढाया है. . . .

मुझे सुलाने. . . .

नन्ही -नन्ही ओस की बूंदे

शीतल, धवल बदन को चूमे

नवल, नील गगन के नीचे

पलकों के पर्दे के पीछे

शरत् पूर्णिमा की रातों का

अमृत रस बरसाया है. . . .

मुझे सुलाने आज …..

✨✨✨🌜🌛 ज्योति मिश्रा✨✨

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