#Kavita by Jyoti MIshra

कितने मगरूर हो तुम ,

किस नशे में चूर हो तुम

कद्र नहीं किसी की चाहत की

पास रहकर भी कितने दूर हो तुम ..

लोग अच्छे हैं जो पराए हैं

हमने अपने भी आजमाए हैं

दर्द सबसे अधिक वही देते हैं

दिल के अंदर जो समाए हैं ..

हम तुम्हारे कुछ भी नहीं

अहसास पल -पल दिलाते हो यही

छोड़ो शिकवा किसी से क्या करना

अब  और जी कर नहीं मरना …

जाओ कुछ भी  अब न बोलेंगे

बंद दरवाजे फिर न खोलेंगे

चलो जाओ फिर लौट जाओ तुम

मेरी नजरों में न समाओ तुम…

होगें जब हम न, समझ में आएगा

गुरूर कौन  इतना चाहेगा

महफ़िल चाहे जितनी सजाओगे

मुझ बिन मुस्कुरा न पाओगे …

ज्योति मिश्रा

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