#Kavita by Jyoti Mishra

सुनो …

बहुत सारी खामोशियां
भेजी थी तुमने
मैंने पढ लीं हैं ,
बदले में मैं भी
कुछ अनकहे लफ्जों को
खामोशी के लिफ़ाफ़े में लपेटकर
भेज रही हूं ,
संभालकर रख लेना
पढ़ सको तो
पढ़ लेना ….
महसूस करना उन शब्दों
के दर्द को
जो सदियों से
सर्द रातों की गलन को
ओढ़ रहे हैं
तुम्हारी संवेदना के लिहाफ़ के
बगैर
ठिठुर कर
दम तोड़ रहे हैं …
मेरे मोहब्बत से लबरेज
वाचाल लफ्जों की बहुत
तौहीन की तुमने ,
कितनी ही बार लौट आए
बैरंग ..खाली हाथ
इस इंतजार में
कि तुम कभी खुश होकर
करोगे स्वागत
खोलोगे द्वार . .
बिठाओगे इन्हें अपने सिरहाने
और हौले से उतर जाएंगे ये
तुम्हारी पलकों के रास्ते
हृदय में
डाल बाहों का हार …
पर तुमने तो इन्हें
देखकर भी
कर दिया अनदेखा ,
जैसे किसी अजनबी ने
दी हो दस्तक ,
तुम्हारे जीवन में
नहीं हो इनकी
कोई रूप -रेखा ..
हां . . अब मैं भी
खोखली हंसी
नहीं हंस सकती ,
दोस्ती मुझे भी बहुत अजीज है
रिश्तों की कद्र ,
थोड़ी, तमीज़ है ..
पर अगर गैरत न हो
तो रिश्ते शर्मिंदा करते हैं
सर उठाने में झिझकते हैं
खुद्दारी है , घुटती
सिसकती …
तो बस तुम्हारी
बेरूखी को तुम्हारे
अंदाज में ही
वापस किया है …
जो पाया है अब तक
वही वापस किया है ….
मुखर हो गया मौन अब
फैल गया सन्नाटा
यही है जो तुम समझते हो
नहीं आती है मुझे
प्यार की ये भाषा
उम्मीद है अपने लफ्जों में
खुद को पाकर समझ जाओगे
क्या महसूस किया है मैनें
अहसास करोगे ,
फिर न किसी के साथ
तुम दोहराओगे….

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