#Kavita by Jyoti Mishra

जो अक्सर बाहर  मौन रहते हैं

वह भीतर तूफान लिए रहते हैं

ऑखों में  सागर की लहरें मचलती  है

होठों पर  लेकिन वो मुस्कान लिए रहते हैं

ख्वाहिशें हजारों सीने में दफन होती हैं

अपनी ही मौत का वो सामान लिए फिरते हैं

पलकों पे ख्वाब बेबस रातों को टहलते हैं

होती नहीं शब जिसकी वो शाम लिए फिरते हैं

हर सांस पे होते हैं जख्मों के निशां लेकिन

मरहम लगाने औरों को , हाथों में लिए चलते हैं

होते हैं फकीर बदकिस्मत, मोहब्बत के मारे वो

पर बांटने को दोस्तों  को, दोनों जहांन लिए रहते हैं

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