#Kavita by Jyoti MIshra

चांद घर से निकल रहा पूनम
बन संवर ले, तू भी अब शबनम
बुझने देना न, उम्मीदों की ज्योति
बूंद गिरकर ही तो बनेगी मोती ….।

कैसे कहते हो, मैं पराई हूं !
तेरी रग – रग में मैं समाई हूं
तुमसे मुकरा यूं न जाएगा
थोड़ी पी लो, तो होश आऐगा…।

खुद को धरती बनाने की जिद्द है. .
तेरा चक्कर लगाने की जिद्द है
तुम जो चंदा न बन सके मेरे
तुझको सूरज बनाने की जिद्द है. . . ।

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