#Kavita by Kapil Jain

भोर की किरणें

और उजाला

निशा के चुंगल से

जैसे बंद खिड़की के

शीशे से होकर

मुझ तक

आ रही हैं

क्या वैसे ही

मेरे विचारों की

ऊष्मा और गहनता

तुम्हारे मन तक

पहुँच पाएगी

मेरा रोम-रोम

जिस तरह जी उठा है

किरणों के आगमन से

क्या तुम्हारा मन भी

अकुरिंत होता है

मेरे इन

भावुक शब्दों से

जैसे ये किरणें

मेरे अंतर्मन को

सहलाती हैं

क्या मेरे विचारों का

दिवाकर

तुम्हारे कोमल ह्रदय को

बहलाता ?

यदि हाँ, तो आज अभी

मन की खिड़की खोलो

इन शाब्दिक

किरणों से

ओत-प्रोत होकर

आगमन करो

नव प्रभात !

नव लालिमा

नये दिन का…

Leave a Reply

Your email address will not be published.