#Kavita by Kavi Krishan Kant Dubey

“वसंत आ गया”
*
धरती का कण-कण
तृण-तृण
फूल बनकर खिलने लगा
वसंत आ गया |

सरद हवाओं से निकल
जन-जीवन धूप की गरमाहट से खिलने लगा
तन-मन मौसम की मादकता पा मचलने लगा/देखों
वसंत आ गया|

सरसों के पीले फूलों/फलियों से
खेत झूमने लगे,
गेहूँ की बालियाँ लहराने लगी
वसंत आ गया|

आम के पेड़ों पर बौर लदने लगा
कोयल मधूर गीत गाने लगी
मोरनी छम-छम नाचने लगी
फूलों की रंगत देख
तितलियाँ उड़ने लगीं
चटकीं जो कलियाँ
भौरें गुन-गुन करने लगे
हवाओं में खूशबूओं का आना-जाना होने लगा
वसंत आ गया|

युवाओं-युवतियों के तन-मन मचलने लगे
हर एक के अधरों पर राग-रागनी सजने लगे
पिऊं की आस में बैठी विरहनी भी
गीत मिलन के गाने लगी
महकने लगी धरती
महकने लगा आसमान
वसंत आ गया|

खेत-खलियान
ऊसर-बंजर
गांव-गली
धरती-आसमान
प्रकृति का संपूर्ण संसार
खिलखिला रहा
लहलहा रहा
फूल रहा
फल रहा
इन सबको देख
मन जोई-सोई कुछ
गुन-गुना रहा
वसंत आ गया|
* *
कवि कृष्ण कांत दुबे
कन्नौज

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