kavita by kiran singh

–                               – सीख लिया
मर मर कर जीते जीते , मरकर जीना सीख लिया
जब जिन्दगी ठोकर खाई , खुद सम्हलना सीख लिया

मॄगतृष्णा में भटक रहे हैं , भाग रहे सभी यहाँ वहाँ
आस लगाए चातक पंक्षी , स्वाति बूंद मिले कहाँ

छलकर विजयी झूठ हो रही , टूट रहा सच दर्पण
लोग मुखौटा लिए लगाए , बदल रहे हैं क्षण क्षण

जड़ें जमाकर भ्रष्टाचार , .अब हैं  वो आचार बनी
जमा हो गया काला धन , ऋणी माँ भारत बनी

स्वहिताय को मिल रहे , बढावा जमाखोरों को
सभी प्रलोभन स्वयं दे रहे , लोभी रिश्वतखोरों को

सीधेसादे लोगों ने भी , छलप्रपंच अब सीख लिया
जब जिन्दगी ठोकर खाई , खुद सम्हलना सीख लिया

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