#Kavita by Krishan Kuamr Saini , Dausa

मातृभाषा~हिन्दी

अनजाने में कविता पाठ किया करता हूं !

सबके हृदय में अपने स्वर से जोश नया भर देता हूं !!

सब कहते हैं काश मैं भी कभी बन जाऊं !

मैंने कहा, बिल्कुल बनो और जग में नाम कमाओ ! !

कवि लोग ही हैं जो हिंदी का शुद्ध प्रयोग करते हैं !

राष्ट्र भाषा हिंदी का अपने जीवन में उपयोग करते हैं !!

हिंदी को अपनाने में क्यों शर्म हमें आती है !

मातृभाषा बोलने में क्या इज्जत कम हो जाती है !!

मैं अंग्रेजी का विरोधी नहीं हिंदी का प्रबल समर्थक हूं !

मातृभाषा हिंदी अपनी इसका ही सबल समर्थक हूं !!

नहीं लज्जा आनी चाहिए हमें हिंदी को अपनाने में !

कृष्ण तुम्हें कहता शर्मिला क्या पाप है हिन्दीको अपनाने में   !!

कृष्ण कुमार सैनी”राज

दौसा,राजस्थान

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