#Kavita by Kshitij Bawane

°°’हिज़ड़ा’ कौन?°°°

वो ‘हिजड़े’ हैं!

कुछ ऐसा ही कहते हैं उन्हें,

ये समाज वाले लोग|

कोई हँसता है उनपर,

कोई अजीब नज़र से देखता है!

लेकिन किसी से कभी सोचा,

कि वे भी इन्सान हैं,’शो-पीस’ नहीं!

क्या फर्क है उनमें और हम में?

मात्र शरीर की बनावट का|

क्या उन्हें हँसने-रोने का हक नहीं है?

क्या वे हमारे साथ उठ-बैठ नहीं सकते?

ये सवाल कभी पूछने चाहिये हमें खुद से!

इन सवालों के जवाब अगर ‘ना’ हों,

तो इसमें गलती हमारी है|

इससे पता चलेगा हमें,कि

‘हिजड़े’ वो हैं,या हमारी ‘सोच’!

क्या ‘हिज़डा’ या ‘सामान्य’ कहलाने को

बस शरीर की बनावट ही एक पैमाना हो?

क्या वे किसी अलग तरीके के जन्मे हैं?

क्या वे किसी अलग तरीकों से जीते-मरते हैं?

सच्चे मन से खोजें इन प्रश्नों के उत्तर,

सभी के जवाब ‘ना’ हों तो बेहतर है!

अगर जवाब इसके विपरित मिलें,

तो फिर खुद से यह सवाल करें,कि

”हिज़डा’ कौन?”,

वे या हमारी ओछी सोच!

©क्षितिज बावने

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