#Kavita by kumud ranjan jha

फिर भी क्यों??

फिर भी क्यों *************।

वहजानती है।

वापस फिर से ,

कर दी जाऊंगी।

प्यार के दो पल भी,

संग रहकर  जी ना पाऊंगी,

लिपटती है लहरें।

किनारों से ,

फिर भी क्यों??

वह जानती है।

बरस कर बूंदों सी,

बिखर मैं जाऊंगी,

दो प्यार भरी बातें भी,

उनसे ना हो पाएंगी,

आसमान का आलिंगन,

करती है बदली।

फिर भी क्यों??

वह जानती है

लौ से जल जाऊंगी,

मेरा सत्व सिमट जाएगा,

सानिध्य की आशा मे,

लौ के तपिश मे,

जलती है जुगनू।

फिर भी क्यों?                                           ©    कुमुद”अनुन्जया”

4 thoughts on “#Kavita by kumud ranjan jha

  • March 31, 2016 at 12:33 pm
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    बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति महोदया , सुन्दर सृजन हेतु बधाई स्वीकारें 🙂

  • April 1, 2016 at 2:21 pm
    Permalink

    बहुत बहुत धन्यवाद अमित जी सब आपलोगों के सहयोग कि परिणाम है।

  • April 1, 2016 at 2:23 pm
    Permalink

    धन्यवाद रवि जी आपका मार्गदर्शन व नवसृजन जिन्दाबाद।

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