kavita by Madhu Chaturvedi

………..बूंद सी ख्वाहिश थी , सागर जैसी शीद्दत से चाही थी……

……….पल भर खुद के जिन्दगी की मिलकियत की गुज़ारिश थी….

……….जिन्दगी की अहमियत समझ कर भी बेमकसद गुज़ारना उम्र..

……… मेरे लिए उसूलो में रहने की बस इतनी सी तो कीमत थी….

…………खुला आसमा देख कर भी समेट ली सहम के पाखे हमेशा

……… एक बार उड़ान भर के देखू , इतनी छोटी सी हसरत थी…..

……….हर दायरा, इज्ज़त , हद ,तालीम, लिहाज मंज़ूर मुझे  ……….

………. मेरा झुका सर ही  है सलीका, मेरे लिए ये कैसी नसीहत थी……..

………  हर कदम पे  “दुनिया की नजर” से  खुद को देखू पहले …..

………  मौला तेरी दुनिया में मेरे लिए ही लिए कैसी ये दहशत थी…

…………कुछ मुनासिब से सवाल पुछू  ,कुछ लाज़मी से जवाब दू…..

……….. तो क्या ये गुनाह मेरे घर के कायदों की फजीहत थी…

…………कोई कसूर या तौहीन तो नहीं इजाजत मांगना….

……… मैं भी हूँ जिन्दा बड़ी मामूली सी मेरी भी चाहत थी…

………..मेरे खवाब, वक़्त,.इरादे ,मकसद ..कुछ भी नही मेरी हद में…

..   …दुनिया की मुझ पर ही ये कैसी हुकुमत थी

……… खुद का फैसला खुद लू बस इतनी सी गुजारिश थी….

………बूंद सी ख्वाहिश थी सागर जैसी शिद्दत से मांगी थी…………

……..कुछ कमज़ोर से ख्वाब पल ही जाते है पलकों पे…..

……..इतनी बेपरवाही से न करो बेरंग इतनी सी शिकायत थी…………..

…… न तख्तो ताज चाहा कभी बस इतनी सी हसरत थी….

…… छोटे से दिल को मामूली से अरमानो से मोहब्बत थी…..

…….साँसों के थमने से पहले खुली हवा में एक सांस ले लू…..

…..ऐसी आरजू गर है तो क्या ये जमाने से खिलाफत थी…..

…..सभी बंद तालो के बाद भी सूराखो से छन के आती रौशनी  है…..

…..मैंने ये बता दी तो क्या हंगामा और आफत थी…..

……कद्र हर रिश्ते की मुझको है अब ये मैं कैसे बताऊ….

…..लेकिन गैरत मेरी  जिन्दा है बता दी तो ये बगावत थी….

……बूंद सी ख्वाहिश थी सागर जैसी शीद्दत से चाही थी……….मधु

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One thought on “kavita by Madhu Chaturvedi

  • November 26, 2015 at 8:19 am
    Permalink

    भाव अच्छे हैं …बहुत सुंदर कविता

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