#Kavita by Meenakshi kaith mottan

हाँ ……मैं नारी हूँ

सूरज की भांति जलती हूँ
दिनभर उजियारा करती हूँ।
शाम हुए तो ढाल जाये सूरज
पर मैं फिर भी कल-कल बहती हूँ।
मैं पैदा तो होती हूँ जन
पर सब समझे मुझे अपना धन
फिर सौंप कर दूजे को
मुझे कर देते अर्पण
कन्या से बन जाती हूँ
फिर मैं किसी का पत्नी धन
पत्नी बनी, फिर माँ बनी।
नहीं रहा कुछ अपना जीवन
करती रही बस उनके लिये अभिलाषा
न कुछ रही अपनी आशा
गर लांघी कोई सीमा सीता बनकर
जीना पड़ा फिर दुःख भोगकरराधा बन फिर भटकी मैं बन-बन
त्यागना पड़ा मुझे फिर जन जीवन
बन पांचाली भी मैं आई थी
जब पतियों ने दांव पे लगाई थी
रोती रही चिल्लाती रही
न पतियों का दिल पिघला
आखिर में मुझपे ही कलंक लगा
युग-युग में बस मुझे सताया है
फिर क्यों भगवान ने मुझे बनाया है
कहा…. ऊँचा होगा तुम्हारा स्थान
पर नहीं होगा तुम्हे कोई अधिकार
भगवन भी कर गए देखो धोखा
कहा बनो बस तुम जन्मदाता
कर दो सभी अपनी इच्छाएं मृत
और करो अपने मातिर्तव से सृष्टि को अनावृत।

मीनाक्षी कैथ मोट्टन

Leave a Reply

Your email address will not be published.