#Kavita by Mukesh Aman

नोटबंदी के बाद देशभर में फैली अव्यवस्थाओं के बावजूद मेरे सब्र का बांध उस समय टूट गया जब देश के माननीय प्रधानमंत्री श्री नेरन्द्र मोदी ने 25.11.2016 शुक्रवार को भ्रष्टाचारियों व कालेधन कुबेरों के लिए अपार धन को सफेद करने के लिए 50ः50 की योजना की घोषण की । जिसके तहत् इन कालेधन वालों को सरकार को उदाहरण के लिए 100 रूपयें में से 50 देकर 50 रूपये को दूध का धूला करने का मौका मिलेगा । इससे मैं भारत के आम नागरिक की हैसियत से बहुत आहत् व दुःखी हुआ । जिसके बाद बहुत दुखी होते हुए यह रचना पोस्ट कर रहा हूं:-
इस पोस्ट के भविष्य को मैं अच्छी तरह जानता हूं मगर मेरा देश सबसे पहले है:-
नोटः- मेरी रचना पढ़ने से पहले अपनी आंखों पर लगी पट्टी जरूर हटा दें । फिर निष्पक्ष व निष्भाव से रचना व परिस्थितियों का मूल्यांकन करे ।
500 का नोट

कल तक जन जन का प्यारा जो,

आज हुआ बेसहारा है ।

नोट 500 का साथी अब ,

लगता सबको खारा है ।।
जिसने बीते कल में सबको,

जीवन में खुशियां दिलवाई ।

आज उसी पर पाबंदी से,

सबकी खुशियां हुई हवाई ।।
नोट 500 की कीमत नही ,

सदमे में देश हमारा है ।

नोट 500 का साथी अब ,

लगता सबको खारा है ।।
बैंक, एटीएम, डाकघरों पर,

लम्बी रोज कतारें है ।

क्या ये लोग ही आज वतन में,

कालेधन को धारे है ।।
दीन दुःखी, मजदूर, कृषक जन,

अब लगता मारा-मारा है ।

नोट 500 का साथी अब ,

लगता सबको खारा है ।।
कौन बताये, कौन कहे अब,

इस लाईन की आफत कैसी है ।

कितनी जानों की कुरबानी ,

घर में अवसर, हो गई कैसी-कैसी है ।।
मुश्किल में, दुविधा में ऐसी,

संकट में भारत सारा है ।

नोट 500 का साथी अब ,

लगता सबको खारा है ।।
धन्ना सेठों, कोठीवालों ,

या अम्बानी, अड़ानी पर ।

कोई कार्यवाही कर दिखलाये,

क्या निकलेगा झोंपड पट्टी, इस ढ़ाणी पर ।।
चबुक सीधा उन पर मारो ,

जिन्होेंनें बहुत ‘डकारा’ है ।

नोट 500 का साथी अब ,

लगता सबको खारा है ।।
त्राहि-त्राहि चहुंओर है ,

किसने कान छुपाये है ।

जन की जान दांव पर रखकर,

किसने सब्ज-बाग दिखलाये है ।।
नही जरूरत किसी ‘‘मार्क’’ की,

वतन हमें भी प्यारा है ।

नोट 500 का साथी अब ,

लगता सबको खारा है ।।
कालेधन और भ्रष्टाचार पर,

लगे लगाम, कस जाये नकेल ।

हर कोई चाहता सही दोषी को ,

मिले फटाफट सीधे जेल ।।
पर मोदीजी आप बताओ ,

यह किसकी ओर इशारा है ।

नोट 500 का साथी अब ,

लगता सबको खारा है ।।
रोज बदलते फरमानों से ,

आम आदमी बहुत दुःखी है ।

कालेधन वाले, मोदी जी,

कल जैसे ही आज सुखी है ।।
लगता कई सालों के बाद

फिर से भारत हारा है ।

नोट 500 का साथी अब ,

लगता सबको खारा है ।।
तू भी खा, मैं भी खाउ ,

छोड़ जमाना रोने दे ।

फिफ्टी-फिफ्टी कर दिया है ,

अब जल्दी से आने दे, आने दे ।।
देनी थी ‘‘सेठों’’ को सुविधा,

क्यूं हमकों सड़क उतारा है ।

नोट 500 का साथी अब ,

लगता सबको खारा है ।।
आम आदमी कब बोला है ,

राजतंत्र या लोकतंत्र में ।

अंत ‘अति’ का ‘लोक क्रान्ति’,

समाधान है इसी मंत्र में ।।
अतिवाद का अंत हुआ है,

जन जन को जब ललकारा है ।

नोट 500 का साथी अब ,

लगता सबको खारा है ।।
सबको एक तराजू तोलो ,

मन चाहे वो तुम ही बोलो ।

हर कोई चोर, उचका लगता,

यह इंसाफ कहां का बोलो ।।
लेकिन एक दिन जन जागेगा ,

यह कुदरत का धारा है ।

नोट 500 का साथी अब ,

लगता सबको खारा है ।।

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