#Kavita by Mukesh Marwari , Nawalpuri

एक व्यंग्य
कन्या भ्रुण हत्या और आये दिन हो रहे दुष्कर्मों पर

“कन्या भ्रुण और माँ ”

अच्छा किया माँ मुझे जो कोख में ही मार दिया |
हवस के इन भेडिया से पकड़ से तो पार किया |

मानती हूँ पापा का मैं प्यार तो पा सकती थी |
आपके इन हाथों से दुलार तो पा सकती थी |

दादा जी के कंधो से में आसमां में घुमती |
भाई संग खेलती , मैं  इस आँगन में झुमती |

बचपन कि अठखेलिया , तेरे आँगन में मारी होती |
पर जवानी की उम्र तेरे कलेजे पर भारी होती |

गली के दुस्सानो से मुझको तु कैसे बचाती |
लाखों बैठे दुस्सान जहाँ मे इतने कृष्ण कहाँ से लाती |

शुक्र है तेरा माँ जो इस नरक से उभार दिया |
अच्छा किया माँ जो मुझे कोख में ही मार दिया |

बात यही खल रही है तेरा प्यार  माँ मैं पा ना सकी |
बाबुल की जिन्दगी का दुलार भी मैं पा ना सकी |

आँगन की तन्हाईयो में चिडियों सी चहका ना सकी |
माँ मै तेरी जिन्दगी को बागों सी महका ना सकी |

उससे पहले ही तुने जिन्दगी बोझ यूँ उतार लिया |
अच्छा किया माँ जो मुझे कोख में ही मार दिया ||

कैसे सहती तु वो पिड़ा जब मैं हवस का शिकार होती |
मानवता के किसी दश्मन की रंजिस का शिकार होती |

कैसे सहती तु वो पिडा़ जो सागर से भी गहरी होती |
राजनिति के शासन के आगे तु लाचार होती |

शासन के इस चक्रव्युह से मुझको तुने उभार दिया |
अच्छा किया माँ मुझे जो कोख में ही मार दिया ||
हवस के इन भेडियों कि पकड़ से तो पार किया ||
कवि मुकेश मारवाड़ी
नवलपुरी

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