kavita by narpat ashiya ‘ vaitalik’

कविते! मैं सजदा करूँ🌺
कविते ! तुझको क्या कहूँ, छुई मुई या और ।
मन में गहरी पैठ कर, फिर फैलाती छोर ॥1॥
कविते ! तुझको दूँ सजा, आ मन की दहलीज़।
आज चाँद है ईद का, कल आषाढी बीज ॥2॥
कविते ! तुम कमनीय हो, कोमल है तव गात ।
आ फूलों से दूँ सजा, हँसकर कर ले बात ॥3॥
कविते ! तुम ही प्यार हो, तूँ ही जीवन सार ।
अलंकार रस से सजे, पहने नवलख हार ॥4॥
कविते ! तनिक दुलार दे, कर ले मुझसे प्यार ।
तेरे बिन तो फूल भी, लगते हैं अंगार ॥5॥
कविते ! तूँ नाराज़ हो, या फिर मुझ पर रीझ ।
छेडूंगा फिर आज मैं, आ मन की दहलीज़ ॥6॥
कविते ! जब जब आ गया, सुन सजनी तव पास ।
तब तब मुझको चूमकर, मेटी तुमने प्यास ॥7॥
कविता तुम कमनीय हो, तथा सुकोमल गात ।
हर पल बस हँसती रहे, औ’ बाँटे सौगात ॥8॥
कविते ! मन में पैठकर, फिर मत करना घाव ।
जब मन तुझ पर आ गया, तब कैसा अलगाव ॥9॥
कविते ! मैं सजदा करूँ, या फिर कह पाबौस ।
चौखट तेरी चूमते, ही होता मदहोश ॥10॥
कविते ! तेरी गोद में, सिरहाना कर सोउँ ।
तूँ हँस हँस बतिया तनिक, मैं जी भर के रोउँ ॥11॥
कविते ! सच्ची सहचरी, चाहूँ तेरा साथ ।
इससे ही तेरी गली, फिरता हूँ दिन रात ॥12॥
कविते ! आँचल में छुपा, अब कर दे अहसान ।
नरपत निरा अबोध है, नन्हा सा नादान ॥13॥
कविते ! मात पयस्विनी, मीठा तेरा दूध ।
मैं अबोध भूखा शिशू, कान्हा सम हिय शुद्ध ॥14॥
कविते तुम आती नहीं, अब क्यों मन के पास।
या तो है रुठी हुई,या फिर घोर उदास॥15
नरपत आशिया “वैतालिक”

2 thoughts on “kavita by narpat ashiya ‘ vaitalik’

  • December 3, 2015 at 6:16 am
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    कविते ! मात पयस्विनी, मीठा तेरा दूध ।….मैं अबोध भूखा शिशू, कान्हा सम हिय शुद्ध—- Ee kavi ke maan se kavita ger ruthi hui aur udaas bhi hoti hai to bhi shabdoo ke khajane bhar hi deti hai…to sochiye ek kavita kavi ke liye kya kya hai??? ye ekdam kalapna se pare hai…bahut hi umda srajan aapka- very nice —- (NISHA)

  • December 3, 2015 at 4:14 pm
    Permalink

    thanks for your valuable comments

    Vaitalik

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