kavita by neeloo neelpari

ख्वाब आँखों में थे
नींद कोसों दूर थी
अपलक शून्य में झांकती
पगली दुनिया के रंज ओ गम से दूर थी

पूनम की रात थी
चाँद अटारी पे था
मगर उसका चन्दा
पर्वतों की कंदराओं में गुम था

अतीत करवट बदल सामने खड़ा था
नाकामयाबी की काली परछाई के रूप में
भविष्य की अनिश्चितता वहीँ खड़ी
मुंह बाए उस पर हंस रही थी

पौ फट, भोर की लालिमा पुकार रही थी
डूबते सूरज की उपासना तो कर चुकी
एक बार फिर उसको ‘नीलपरी’
नव् उषा के उगते सूरज से नज़रें मिलानी थी

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