#Kavita by Ompal Sharma

छेड़ी जो जंग हमने ,तेरा विनाश होगा |

हिन्दू मरे या मुस्लिम , इंशा का नाश होगा ||

ऐसे न मिलती जन्नत,न हूरो का साथ मिलना |

इन्शानियत न सीखी , रह रह हताश होगा ||

कर ले अभी भी मानव , अपना करम तू तेरा |

वो ले यहाँ जो चाहे , तेरा खुद का  वास होगा ||

लहराती ये  इमारत , नभ् चूमते कंगूरे |

जाये न साथ कुछ भी , धेला न पास होगा ||

भेजा तुझे है उसने,  इंशा यहाँ  बनाकर |

इंशा से उस खुदा का , रिश्ता जो ख़ास होगा ||

बन जा ओम अब भी मानव ,इन्शान से फरिस्ता |

तू जीयेगा दिलो में तेरा सबको आस होगा ||

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