#Kavita by Pankaj Sharma Jhalawad

चुड़ी वाली अम्मा

चार आने की तीन गोली

औऱ अम्मा की वो हँसती आँखें

बच्चों से घिरी

बाँटती चंद सिक्को के बदले

बचपन की मीठी खुशियाँ

मेरे घर के नुक्कड़ की पहरेदार

वो चुड़ी वाली अम्मा

मेरी यादों में अभी भी शेष है।

सुबह को जगाने वाली

सहर की अजा़न सी

रात की अलसायी गंदगी

को गली से बुहारती

बेहिसाब हुए शरीर को

वर्जिश की सलाह देती

सबकी बलाए लेती

ढेरों  दुआएं देती

मेरे मोहल्ले की चोकीदार

वो चुड़ी वाली अम्मा

मेरी यादों में अभी भी शेष है।

लाल,पीली, हरी काँच की चुड़ीयाँ

लाख की चुड़ीयाँ,

हाथों को सहलाकर

बातों में पहना देती चुड़ीयाँ

कितना सलीका था,असहज हाथों में

शोख बातों से

उलझा देती चुड़ीयाँ

बचपन से लेकर सफेदी तक,

हर उम्र को सजाती थी

वो अम्मा..

मेरे गांव का श्रंगार..

वो चुड़ी वाली अम्मा

मेरी यादों में अभी भी शेष है।

वर की निकासी हो या

डोल का जलझुलना

हर पूजा, हर रीत..

पर उसका अधिकार था।

राधा की मेंहदी हो या

शादी के बन्ने

हर गीत ,

पर उसका अधिकार था।

मंदिर के तिराहे से ,

गांव की चोपाल तक

आँख की बदमाशी से

चुड़ीयों की चित्कार तक

हर क्षय पर खबरदार थी अम्मा

मेरा बचपन, गांव की रौनक

आज का खुला पर,

छुपा अखबार थी अम्मा

मेरे शहर में,गांव की सी तहजीब..

अदबदार अम्मा

वो चुड़ी वाली अम्मा

मेरी यादों में अभी भी शेष है।

चुड़ीयां कुछ अधूरी सी है,

कुछ दराजे भी खाली है..

उग आयी है चबुतरे पर

कुछ बदमाश खरपतवारें

गया था मैं उस तरफ

अशक्त शरीर अपना रंग दिखा गया

पोता री बहु री चुड़ीयों में बेबसी दिखा गया

जचगी में जिनके डग भरती रही

वो दो कदम आगे नहीं आये…

घर के जश्न में,

निस्तेज आँखों को

सपने दिखाने नहीं लायें…

अंतहीन राहों को तकते वो थक गई,

चुक गई,

बंद हो गई।

राख हुई,

धुएं में तब्दील हो गई वो

सैंकड़ों हाथों की चुड़ी वाली अम्मा..

कुंवारे कंगन से सुर्ख चुड़ी वाली अम्मा

सुहाग से आठवें की चुड़ी वाली अम्मा

हर कलाई को सुंदर बनाने वाली..

वो चुड़ी वाली अम्मा

मेरी यादों में अभी भी शेष है।

पंकज शर्मा

258 Total Views 6 Views Today

Leave a Reply

Your email address will not be published.

Whatspp dwara kavita bhejne ke liye yahan click karein.