#Kavita by pankaj sharma

मुकम्मल वक्त बता देती है..
मुझे मंदिर की घंटियाँ
ये जरूरी नहीं कि जगाने
के लिए भगवान ही आएं

दिख जाता है सत्य मजलूम
की आँखों में भी
ये जरूरी नहीं कि
इसके लिए श्मशान ही जायें

बाईज्जत बरी हो जाता है
बडा आदमी
होकर गलत भी…
क्या ये जरूरी है कि उसकी
पैरवी कर हम
बदनाम हो जायें

मेरे घर के कबाड़ में पडे है
कई टूटे फूटे खिलौने….
माँ से फिर माँग लु
एक खिलौना ….
एसे अरमान कहाँ से लायें…..
पंकज शर्मा

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