#Kavita by Prakash Prabhakar

खनक

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शहर के कोलाहल में,

न जाने कहाँ खो गया।

एक हताशा भाव,

इन उल्टे-सीधे मार्गों पर चलते,

कोई नहीं पुछता।

मात्र ! हृदय की

एक शांत खनक और पिड़ा ,

साथ भी और अविछिन्न भी;

भोर होने की प्रतिक्षा में

खनकती रहती है।

व्यर्थ की उलझने,

प्रयत्न और आशक्ति,

तड़फता हृदय का कोना

विचार करता

शायद स्वयं से पृथक है

यही असतित्व का बोध।

परन्तु नहीं,

मैं ही ,मैं है , निरन्तर भटकता

अपने ही आलोक के

तिमिर में धँसा,

जीवन की संम्पूर्णता

मैं ही है।

©  प्रकाश ‘प्रभाकर’

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