kavita by pratap singh negi

–                          -‘ अन्तर – द्वन्द ‘

बदलता जीवन ,

है चेतना का ये

‘ अन्तर – द्वन्द ‘ I

निराशा , वेदना , सूना – पन ,

कहाँ जा डूबता ,

ये पागल मन I

ये दुनियां दारी ,

वो मस्त जीवन ,

ये जिम्मेदारी ,

वो अल्हड़पन I

डगमगा उठते बड़ते कदम ,

व्याकुल हो जाता

मेरा मन I

आती ग्रीष्म – बिताता बसंत ,

डूबती शाम का

स्वर संगम I

क्यों बदल रहा है

ये जीवन क्रम ?

चेतना का ये ‘ अन्तर – द्वन्द ‘ I

कहाँ जा डूबता ,

ये पागल मन I

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