kavita by praveen mati

एक बात कहूँ मैं मन को

एक बात कहूँ
मैं मन को
साल के कुछ दिन बाकि
शरद के साथ बैठी साकी
कितने लिखें मुक्तक
कितने गाये
कितने मोती बिखर गये
मैंने कितने उठाये
असमंजस में पड़ा
कहां छुपाऊँ
इस प्रेम धन को
एक बात कहूँ
मैं मन को
मिथ्या-सागर संसार
घर-घर विराजा अहंकार
अपनी थाली को ठुकराते लोग
विषव्याप्त मिठाई देख मुस्काते लोग
बंधुजनों
प्राणी मात्र से प्रेम करो
राम नाम सुबह-शाम भजो
यही समझाऊँगा
जन-जन को
एक बात कहूँ
मैं मन को
पथिक अनेक
मंजिल एक
अंधे, भटके को
मोह माया में अटके को
राह दिखलाते चलो
शब्दों के स्पर्श से सिखलाते चलो
पिपासा जागने दो ज्ञान की
उद्घोष करो भारती महान की
जानते सभी हैं
मिट्टी होना है
इस सुंदर तन को
एक बात कहूँ
मैं मन को
देख तो जरा
मानस के भीतर
बुद्ध का चित्र
शक्ति-पुंज जलाये रखो
वाणी मधुर को सजाये रखो
भ्रम के अंधेरे में
पाखंड के सवेरे में
उजाले का संचार करो
धरा मूर्छित, जगाने का विचार करो
रोक लेना
इस मानवता के पतन को
एक बात कहूँ
मैं मन को

कवि -परवीन माटी

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