#Kavita by Rajendra Bahuguna

भाई,भतीजा,भानजा, भाट,भाण्ड,भटिहार
तुलसी षट भकार से सदा रहो हुसियार
भानूमति का कुडमा
मिंया मुलायम के घर में दीवाली के बम फूट रहे हैं
खानदान के सारे दस्यु खुद बीहड से छूट रहे है
राम मनोहर लोहिया के अवशेष चटक कर टूट रहे हैं
समाजवाद को चाचा और भतीजे मिल कर कूट रहे हैं

सबके अपने-अपने चमचे, अपनो की जय बोल रहे हैं
सब खानदान के कच्चे चिटठे चौराहों पर खोल रहे हैं
चिटठी-पत्री के असलहों से विस्फोटक को दाग रहे हैं
असमंजस में मिंया मुलायम भटके-भटके भाग रहे है

शिवपाल तो सांप लपेटे, शंकर बन कर झूम रहा है
रामगोपाल बम्बई के बाजारों में गुमशुम घूम रहा है
अखिलेश भी सी.एम. की कुर्सी से फतवे चला रहा है
शकुनि मामा अमरसिंह अब खानदान को जला रहा है

आजम खां भी मौन खडे, रमजान सियासी देख रहे हैं
बेनी बाबू हवन-कुण्ड की लपट ज्वाल को सेंक रहे है
राम मनोहर के खण्डहर की जीर्ण दीवारे टूट रही हैं
सपा सियासी परिवारों की मिलकर मिट्टी कूट रही है

अकुलाहट में भूखी प्यासी बी.जे.पी. भी भांप रही है
कफन सियासी छत विक्षत शव इंच-टेप से नाप रही है
इन लाशों में भी जिन्दी लाशों को आशा से छांट रही है
राम-नाम की संजीवन को अधमरे शवों में बांट रही है

बुवा होलिका बन कर माया ,टीपू सी.एम. खोज रही है
सच पूछो तो इस झगडे मे बी. एस.पी. की मौज रही है
अब कांग्रेस भी घर के रूठे, मुल्ला, काजी मना रही है
इस बिगडे कुडमे के बिखरे बोट-बैंक को भुना रही है

लावारिस बोटों पर सब की शातिर नजरें गढी हुयी है
कुछ बूढों की गन्दी नजरें जयाप्रदा पर पढी हुयी है
ये समाजवाद का गाद भरा तालाब सूखता जाता है
खानदान के इस कीचड को कवि आग खुलकर गाता है
राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा (आग)
मो0 9897399815

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