#Kavita by rajendra bahuguna

क्या न्याय अभी तक जिन्दा है

न्यायपालिका, कार्यपालिका की औकातें खोल रही हेै

सरकारें भी जूते खाकर , बे -शर्मो सी डोल रही है

अधिवक्ता भी जानबूझ कर बहस अदालत में करते है

संविधान को रचने वाले आज सियासत से मरते है

प्रजातन्त्र भी सत्ताओं की गुण्डा – गर्दी झेल रहा है

फिर भी देखो जनगणमन अधिनायक हमसे खेल रहा है

डेढ अरब की जनसंख्या का बीहड ,ये सब झेल रहा है

जनमानस क्यों प्रजातन्त्र का कुडा-करकट ठेल रहा है

राष्ट्रपति या राज्यपाल जब राजनीति से ही आयेंगे

संविधान के पन्नो पर सब चाट -पकौडी ही खायेंगे

सब सत्ता दल में बैठे नेता अपनी बीन बजायेंगे

अब राष्ट्रपति भी चेलों की ही धुन में गाना गायेंगे

रावण बनकर लक्षमण रेखा ,राम मण्डली लांघ रही हेै

भारत मां भी सीता बनकर,अभय दान अब मांग रही है

इस अहंकार के झगडों से तो भारत माता ही लुटती है

संविधान की श्वांस सियासत के झगडों से ही घुटती है

सर्वोच्च पदों पर दो-कौडी की राजनीति ही क्यों होती है

इस राजनीति से संविधान की मर्यादाएं क्यों खोती हेै

जूते खाकर राजनीति का रूप निखर कर क्यों आता है

क्यों चेैनल पर सत्ताधारी तोता राम – राम गाता है

ये सबसे बडा लोक – तन्त्र है, सारे नेता चिल्लाते हैं

चरित्रवान भी खून सियासत से जनता का क्यो खाते हैं

उत्तराखण्ड,अरूणाचल भी औकात सियासी खोल रहा है

कवि आग जो देख रहा है, वही छन्द से बोल रहा है।।

राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा;आग

मो09897399815

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