#Kavita by Rajendra bahuguna

सुविधा से दुविधा

ये तो निर्णय करना होगा, इधर जाओगे,उधर जाओगे

इस हालत मे भारत मां की रोटी तुम कब तक खाओगे

पाकिस्तानी बनना है, लाहौर कंरांची में बस जाओ

भारत की रोटी खाते हो, थोडा राष्ट्र गीत तो गाओ

सात दशक से पेट काटकर हम ही तुमको पाल रहे हैं

हर कश्मीरी के अन्दर हम भारत को खंगाल रहे हैं

राष्ट्र द्रोह की इस हरकत पर कितना पैसा फूंक रहे हैं

उदारवाद की इस हरकत पर घर के बच्चे थूक रहे हैं

अब भी पाकिस्तानी भूखे नंगो से आशा करते हो

अलगाववाद की आशा तृष्णा में लावारिस ही मरते हो

या तो भारत के बनजाओ या भारत की जमीं छोड दो

दो नावों में पैर रखोगे, तर जाओगे भरम छोड दो

अमरीका इराक ,अरब में जाकर मार काट करता है

ये भारत का उदारवाद है ,टुच्चो से घर में मरता है

सिर से उपर अब पानी है कुछ तो निर्णय लेना होगा

कमजोर नही हैं, दयावान है ,इसका उत्तर देना होगा

कुछ जेहादी पागल जीवन धार सभी की काट रहे हैं

पाकिस्तानी अंगले कंगले कश्मीरी को बांट रहे हैं

ये आर्यखण्ड का मस्तक है त्रिनेत्र यंहा खुल जाता है

कितने आये चले गये, इतिहास यंहा बई खाता है

भीख मांग कर खाने से, कौमी उद्दार नही होता

नौका में छेद हजारों हो तो सागर पार नही होता

अंगलों कंगलों की संगत से सपने साकार नही होते

घास – फूस के जलने से शोले, अंगार नही होते

ये उदारवाद है भारत का जो अब तक तुमको झेल रहा

नादान शिशू की हरकत से वात्सल्य वाद से खेल रहा

सहन-शीलता की हद में कदसे कब तक कहराओगे

ये कवि आग का चिन्तन है मरखप के घर में आओगे।।

राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा (आग)

मो0 9897399815

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