#Kavita by rajendra verma

धरती के लाल

हृदय पत्थर धरे,

नयन आँसू भरे

धरा करती नदी को है विदा,

अशीषे- तुम रहो बेटी!  सदानीरा।

 

चली ससुराल को बेटी

रुदन करती,

हिलोरें दुख की लेती,

अजब-सी एक बेचैनी

हृदय भरती।

 

पिता पर्वत का मन भारी,

उदासी है, मगर फिर भी तसल्ली-

कि बेटी ने कभी मस्तक नहीं झुकने दिया है

किनारों में बंधे रहते हुए जीवन जिया है।

 

विदाई गीत गाते भ्रात निर्झर,

पुरानी सीख देते हैं-

हमारी लाज को रखना,

नहीं पथ से भटकना,

भले अवरोध हों कितने,

नहीं उद्देश्य से डिगना,

भले कितनी निराशा हो,

कभी आशा नहीं तजना।…..

 

हिलोरें ले रहा है कान्त सागर

स्वयं को रख न पाये शांत सागर

मिलन को हो रहा व्याकुल

पठाया लहरों-वाली सेविकाओं को-

धुलें वे ठीक से देहरी

सजायें सीपियों से तट,

छुपा रक्खी जिन्होंने मोतियाँ

अपने हृदय-पट।

 

पचासों शंख, घोंघे और

उनके मित्रगण

बिछाये आँख बैठे

जोहते हैं आगमन।

 

बहूटी आ गयी घर में,

दिया आशीष सूरज ने,

चन्द्रमा औसितारों ने

हवाओं नेदिशाओं ने।

 

समय पर जन्मते हैं मेघ-छौने

बड़े होते-न-होते

वे तुरत ननिहाल चल देते,

पवन को संग ले लेते।…..

 

मिला गन्तव्य जल्दी-ही,

सभी को योग्य अभिवादन

निवेदित ही हुआ था,

लगाया कंठ से सबने!

ठहरने का है आग्रह

पर अभी मौक़ा कहाँ है?

पहुंचना है अभी जल्दी वहाँ पर,

नहीं दो बूँद भी पानी जहाँ पर।

 

चले फिर मेघ अपने लक्ष्य-पथ पर,

कभी दौडें, कभी ठहरें

कभी उमड़ें, कभी घुमड़ें

कि जैसे, खोजते गंतव्य को!

पवन की दोस्ती फिर काम आती है,

पपीहामोरदादुर की हुलस

छिपने न आती है।…..

 

पड़ीं बूँदें टपाटप,

मही की मूर्छा टूटी,

गला सींचा,

कि जैसे, जां में जां आयी

पिया पानी अघाकर,

नहाने का मिला अवसर

बहुत दिन पर,

तबीयत खिल उठी ऐसे,

नया चोला मिला जैसे!

 

चराचर हो गये ख़ुशहाल,

दिया आशीष धरती ने-

जियो लाखों-करोड़ों साल

फलो-फूलो, हमारे लाल!’ 

 

2 thoughts on “#Kavita by rajendra verma

  • January 3, 2017 at 6:52 am
    Permalink

    बहुत सुन्दर…अच्छी रचनाएं करते रहें..शुभकामनाएं..

  • January 3, 2017 at 12:54 pm
    Permalink

    Ati Sunder Kavita

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