#Kavita by rajendra verma

  जूता

 

ये जो जूता है,

फ़कत जूता नहीं है ये,

हमारे पाँव का मालिक है ये.

पहनते हम नहीं इसको,

पहनता है यही हमको

बनाने को हमें भी ख़ास!

 

ये जूते की सदिच्छा है,

उसे पहने कोई पी.एम्.,

कोई सेक्रेटरीडी.एम्.

कोई एम्.पी., मिनिस्टर,

कोई एस्.पी., कमिशनर,

कोई साहब, कोई नायब….

 

उसे तक़लीफ होती है

पहनता है उसे जब-

कोई मुंशी, गार्ड, चपरासी,

कोई ग्वालाकोई माली,

कोई दर्जी, कोई धोबी,

कोई नाई-मिरासी…..

 

फड़ी ऐडि़यां देखकर वह मुंह बनाता है,

बिना मोजे के पैरों से हमेशा ख़ार खाता है।

ये जूता है

जो तय करता रहा

रेखा ग़रीबी की-

इधरसहमा-सा चमरौधा,

उधरअकड़े हुए वुडलैंड,

मोची- ऐक्शन-बाटा!

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