#Kavita by rajul mehrotra

yah aam rasta hai

कुछ बेहिसाब नँगी सच्चाइयाँ खड़ी हैँ
किसको करेँ मना हम यह आम रास्ता है ।
बाग़ी जुलूस को हम कबतक रहेँ सम्हाले
दम तोड़ते दिये को किसके करेँ हवाले
अस्तित्व को चुनौती हैँ दे रहे अँधेरे
सूरज सिसक रहा है बादल तमाम घेरे
कदम-कदम पे बिजली का मिल रहा समर्थन
ढ़हतीं हैँ झोँपड़ी ही यह बात अन्यथा है ।
किसको करेँ मना हम यह आम रास्ता है ।
बलिदान के लहू से भूगोल पट गया है
इतिहास से शहीदोँ का नाम कट गया है
बस्तियाँ ज़लालत की आबाद हो गईँ हैँ
सच्चाइयाँ समय की सुकरात हो गईँ हैँ
हैँ बार-बार सुनते फिर कोई बुद्ध जनमा
अनगिन दिये जले पर उजियार लापता है।
किसको करेँ मना हम यह आम रास्ता है ।
शँका सुलग रही है फिर समाधान कैसा
रक्त सने हाथोँ मेँ कुछ सँधिपत्र जैसा
आश्वासनोँ का हल्ला हो गया गगन मेँ
टाँकेगेँ चाँद तारे हर एक के कफ़न मेँ
सत्ता सजा रही है बाज़ार क्राँतियोँ का
वर्तमान पुस्तक की यह आवरण कथा है ।
किसको करेँ मना हम यह आम रास्ता है ।

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