kavita by ram lakhara

मुझे पानी ही तो बनना है
जग भूमि सर्वत्र पसरा पानी ही तो बनना है
भीतर रहकर पुष्ट करूं मैं तन और मन हमेशा
बाहर गर बह जाऊ तो सौंपू कोई संदेशा
हां मुझे सुख-दुख की वह निशानी ही तो बनना है
जग भूमि सर्वत्र पसरा पानी ही तो बनना है
तीज त्यौहारों उत्सव में रसपान और समर्पण
हस्त उठाकर श्रद्धानवत किया गया पितृ तर्पण
हां मुझे जल-बुझने की कहानी ही तो बनना है
जग भूमि सर्वत्र पसरा पानी ही तो बनना है
शिव मंदिर के गौमुख से निर्गम आचमन के योग्य
कुएं बावड़ी की गोदी पल्लवित जन जन के भोग्य
हां मुझे अपने प्राण का मानी ही तो बनना है
जग भूमि सर्वत्र पसरा पानी ही तो बनना है
घर बाहर की दीवारों पर अल्पित हो मनभावन
खेत तलाबें तर कर जाने वाला चंचल सावन
हां मुझे होठों झरती रवानी ही तो बनना है
जग भूमि सर्वत्र पसरा पानी ही तो बनना है
हक के खातिर पथ में बहते उष्ण् रक्त के शोले
अनाधिकार भीड़ पर पड़ते आंसू वाले गोले
हां मुझे जन गण मन कंठ गानी ही तो बनना है
जग भूमि सर्वत्र पसरा पानी ही तो बनना है
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