kavita by #Ramesh raj

बाल गीत
|| नव कुण्डलिया ‘राज ‘ छंद ||
नटखट बन्दर छत के ऊपर
छत के ऊपर , झांके घर – घर
झांके घर – घर , कहाँ माल है ?
कहाँ माल है ? कहाँ दाल है ?
कहाँ दाल है ? मैं खाऊँ झट
मैं खाऊँ झट , सोचे नटखट | ”
(रमेश राज )
मित्रो !
‘नव कुंडलिया ‘राज’ छंद’ , छंद शास्त्र और साहित्य-क्षेत्र में मेरा एक अभिनव प्रयोग है | इस छंद की रचना करते हुए मैंने इसे १६-१६ मात्राओं के ६ चरणों में बाँधा है, जिसके हर चरण में ८ मात्राओं के उपरांत सामान्यतः (कुछ अपवादों को छोडकर ) आयी ‘यति’ इसे गति प्रदान करती है | पूरे छंद के ६ चरणों में ९६ मात्राओं का समावेश किया गया है |
‘नव कुंडलिया ‘राज’ छंद’ की एक विशेषता यह भी है कि इसके प्रथम चरण के प्रारम्भिक ‘कुछ शब्द’ इसी छंद के अंतिम चरण के अंत में पुनः प्रकट होते हैं | या इसका प्रथम चरण पलटी खाकर छंद का अंतिम चरण भी बन सकता है |
छंद की दूसरी विशेषता यह है कि इस छंद के प्रत्येक चरण के ‘कुछ अंतिम शब्द ‘ उससे आगे आने वाले चरण के प्रारम्भ में शोभायमान होकर चरण के कथ्य को ओजस बनाते हैं | शब्दों के इस प्रकार के दुहराव का यह क्रम सम्पूर्ण छंद के हर चरण में परिलक्षित होता है | इस प्रकार यह छंद ‘नव कुंडलिया ‘राज’ छंद’ बन जाता है |
‘नव कुंडलिया ‘राज’ छंद’ में मेरा उपनाम ‘राज ‘ हो सकता है बहुत से पाठकों के लिये एतराज का विषय बन जाए या किसी को इसमें मेरा अहंकार नज़र आये | इसके लिये विचार-विमर्श के सारे रास्ते खुले हैं |
‘नव कुंडलिया ‘राज’ छंद’ पर आपकी प्रतिक्रियाओं का मकरंद इसे ओजस बनाने में सहायक सिद्ध होगा | ——रमेशराज

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