kavita by Rameshwari bartwal nadaan

गैरो को अपना बनाना सीख लिया
हमने नफ़रतो को भूलाना सीख लिया
यादो की कब्र पर प्रेम फूल चढाकर
गमे हाल पर मुस्कुराना सीख लिया

मंज़िल की ओर कदम बढाना सीख लिया
नाजुक रिस्तो को बचाना सीख लिया
अपनो के दिये जख्मो को
अपनो से ही छुपाना सीख लिया

इंसानियत को धर्म बनाना सीख लिया
टूटे दिलो को मरहम लगाना सीख लिया
सपनो की दुनिया से निकलकर
हकिकत को अपनाना सीख लिया

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