kavita by Rashmi Abhaya

प्यार करने की खुदा ये मजबूरियाँ।
ग़म को भी खुद से छुपाना पड़ा।।

कसम तेरी…कसम मेरी बंदगी की।
तोड़ सारे बंधन रस्में निभाना पड़ा।।

हाथ फूलों से बिंधते हैं दिल-ए-नादां।
आज कलियों से दामन बचाना पड़ा।।

जिनकी नजरों से दामन बचाते रहे।
उनकी महफिल में मुझको जाना पड़ा।।

ये मोहब्बत की ऐसी कशिश देखिये।
मैंने चाहा तो और उनको आना पड़ा।।

मेरी आँखों से आँसू छलक जब पड़े।
उनको लाजिम था दामन बढ़ाना पड़ा।।

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