kavita by ravi kumar

(दादरी काण्ड पर आप सबों के समक्ष ये रचना)
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सवाल जनमानस से
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बाँटने चले हैं वो लहू के लाल रंगों को
बाँटने चले हैं वो अंतस के तरंगों को

रे दम है तो बाँट दिखा , सूरज के किरणों को
दम है तो फिर बाँट दिखा, भू ,मृदा कणों को

दम है तो फिर बाँट दिखा , नभ , जल के विस्तारों को
दम है तो फिर बाँट दिखा,  पर्वत , भू आकारों को

दम है तो फिर बाँट दिखा, सूरज , चाँद , सितारों को
दम है तो फिर बाँट दिखा , मेघ गर्जन ,हुंकारों को

दम है तो कह दे इनसे , तेरा ही अनुसरण करें
दम है तो कह दे इनसे , राह तेरा ही वरण करें

जहर बो रहे हो बस  ,अपनी ही वाणी से
आग भड़काते हो बस , कुकर्म ,मनमानी से

मजहबी बातों से , नफरत सींच रहे हो तुम
आँसू वाली आखों में , लहू खीँच रहे हो तुम

मोहरे बन जाते हो , इन सियासी चालों के
पीने को लहू उतारू , हमदम वतन वालों के

धर्म सहिष्णु वाला मेरा , बोल सम्मान कहाँ है रे
सत्कार अतिथि वाला मेरा , बोल पहचान कहाँ है रे

वन्दे मातरम् वाला मेरा , बोल गान कहाँ है रे
राम , रहीम वाला मेरा , भारत महान कहाँ है रे
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