kavita by ritesh ‘niras’

‘इश्क़ बस खुदा से’
जूनून ए इश्क़ क्या नहीं कर सकताI
बिगड़े हालातो में भी ये मर नहीं सकताII
महोबत करो तुम अपने खुदा सेI
इश्क़ ए खुदाई क्या नहीं कर सकताII
राम, ईसा या कोई भी रूहानी मूर्तI
सुच्चा इश्क़ कभी हार नहीं सकताII
एक बार पंहुच जा उस खुदा की बारगाह मेंI
फिर तू किसी भी शैतान से डर नहीं सकताII
इश्क़ को एक नई ऊंचाई पर ले जाI
उसके बाद तू कभी गिर नहीं सकताII

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