#Kavita by Sailesh Kumar Singh

माँ का आँचल।
स्नेह से भरा , प्यार से सराबोर ।
माँ तुम सबसे निर्मल पावन चरण
जरा दे धो दू माँ ।
अमृत उस जल को माथे पर तिलक सजा कर बोलू माँ।
बहन दिया पत्नी भी अब बेटी की बारी है ,
कैसे मैं गुणगान करू जिस छवि से दुनिया सारी है।
एहसान नहीं चूकता कर सकता मैं इस जनम में माँ।
बस एक एहसान और कर देना।
तुम मेरी माँ बनना हर जनम में माँ।
कितनी बाधा गम दिल में हो।
पर शिकन नहीं माथे पर माँ।
मुख पे मुस्कान थिरकता है।
मेरी खुशिया देखकर माँ।
मैं चाहे जितना थक जाता हूं।
और बोझ तले दब जाता हूं।
हर गम को भूल जाता हूं
तेरा आँचल जब पाता हूं।।

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