#Kavita by sanjay verma ‘drushti’

मनोकामना

ठंडी हवा
मचलकर न चल
वसंत की आबो हवा
कही चुरा न ले जिया
बैचेन तकती  निगाहे
मौसम में देखती दरख्तों को
सोचता मन कह उठता
बहारे  भी जवान होती

वे सजती संवरती
दुल्हन की तरह
झड़ते पत्ते गिर कर
आ जाते मेरे पास
प्रेम पत्र की तरह
प्रेम  गीत गुनगुनाने चले
कोयल की मिठास संग
नादान  भँवरे

धड़कने बढ़ जाती
प्रेमियों की जाने क्यों
जब जब बहारे आती /जाती
बांधी थी कभी  मनोकामना
प्रेम की गांठे
बूढ़े वृक्ष पर ताकि प्रेम अमर हो

संजय वर्मा ‘दृष्टी ‘
125 शहीद भगत सिंग मार्ग
मनावर (धार )

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