kavita by Sanu Awasthi

“  समय की धारा ”
समय की तेज धारा मेँ
स्थिर कुछ नहीँ होता
उजाले से भरी उर्वी
अंधेरे मे डूब जाती है
हरा उपवन समय की चोट से
घायल भी होता है
खिलती है जो कलियाँ
वो टूट जाती है
बहती है जो नदियाँ
वह सूख जाती है
बचपन से बुढ़ापे का
सफ़र मालूम न होता
समय की तेज धारा मेँ
स्थिर कुछ नहीँ होता

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