#Kavita by Shabnam Sharma

भूख

पैदा होते ही

शुरु होती

भूख माँ के दूध से

बदलती रूप

कभी जमीन का

तो कभी सत्ता का,

कभी शौहरत का

तो कभी मकान का,

कभी हीरे का

तो कभी चाँदी सोने का

कभी झोंपड़ी से बंगले का

रिकशा से जहाज़ का

किसी को लड़कों की भूख

किसी को तड़कों की भूख

बढ़ती ही जाती, कभी

संतुष्ट न होती, सोने न देती

भूख रोटी की सिर्फ

रोटी से बुझती

देती इक सुकून

बराबर अमीर या गरीब को

बादशाह या रकीब को

सुलाती चैन की नींद

सिर्फ इक रोटी

सिर्फ इक रोटी।

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